एक मित्र को मैंने कहा -भाई क्या कर रहे।।कल आये नही
उसने ऐसे कहा- अरे क्या कहूँ भाई बहुत व्यस्त रहा।। मैंने पूछा - कहां 
उसने कहा - इंतज़ार में? 
मैंने कहा- किसके
उसने कहा - जो व्यस्त है। 
...ये तो एक बात थी 😄😄

आपने भी कहा ही होगा कभी ...व्यस्त हैं आप।। 😄
थे क्या सच में..? 😄
कहां व्यस्त थे। 
मोबाइल में? जैसे मैं अभी? 😄😄😄

दरअसल ये बस आपकी मेरी बात नही बल्कि हम सबकी है। 
ये बिल्कुल सच है कि जितनी बार हम स्वयं को व्यस्त करार देते हैं। वाकई में हम होते हैं। पर अधिकतर l वहां नही जहां होना चाहिए। 
समझना ये जरूरी है कि हम कहां व्यस्त हैं
यदि हम खुद को वहां व्यस्त कह रहे हैं जहाँ हम बस अपने समय के अलावा और कुछ नही ले- दे रहे हैं जो अपने पास सीमित है। 
तो शायद हमने खुद को रोक रखा है। 
क्योंकि समय को हम तय नही करते वो एक ऐसा बड़ा रास्ता है जिसे आपके मरम्मत की कोई जरूरत नही। आपके इंजीनियर होने न होने से उसे कोई खास फर्क नही पड़ता। ये आपकी मरम्मत के लिए है।। हम सीमित भाग तक के लिए उस सड़क पर उतरे हुए लोग हैं। इसलिए अपेक्षा यह की जाती हैं कि इस सीमित समय में जितनी दूरी तक आपकी मिल्कियत रहे वो बहुत खूबसूरत हो। अपने स्तर में असीमित हो। 
   
 ..और ये तब होगा जब हम अपनी व्यस्तता और अपना ध्येय के बीच दूरी समझेंगे। उसे कम करने का प्रयास करेंगे। हम वहीं व्यस्त रहें जहां से हमें वो मिलता हो जो हमारा ध्येय हो। 👇😊


ध्येय कैसा हो ये आप और हम पर निर्भर करता है।चुनाव हमारा होता है । 
एक Line है न किसी की- 
कुछ ऐसा किरदार निभा कि
परदा गिर जाय पर तालियां बजती रहें।। 
जी। बस यही बात। 
 कुल मिलाकर ये कि उसी पेड़ पर बैठें जिसका फल खाना हो। 😊
 चलिए बहुत ज्ञान हुआ ये तो हम सबको पता है।।। 😄😄
 बहुत धन्यवाद। 💫
|Share....और कुछ कहना है तो वो भी।। |😊💕